वराहमिहिर का जीवन परिचय? वराहमिहिर का जन्म कहाँ हुआ?

वराहमिहिर का जीवन परिचय (Varahamihira Ka Jeevan Parichay), वराहमिहिर का जन्म सन् 505 उज्जयिनी (उज्जैन) में हुआ था। उनके पिता का नाम आदित्यदास था। एक किंवदन्ती के अनुसार उन्होंने सूर्यदेव की घोर उपासना के पश्चात् ही पुत्र प्राप्ति का वरदान पाया था।

वराहमिहिर का जीवन परिचय (Varahamihira Ka Jeevan Parichay)

वराहमिहिर का जीवन परिचय

वराहमिहिर का जीवन परिचय (Varahamihira Ka Jeevan Parichay)

पूरा नामवराहमिहिर
जन्मसन् 505
जन्म स्थानउज्जयिनी (उज्जैन)
पिता का नामआदित्यदास

प्राचीन भारतीय ज्योतिषाचार्यों में वाराहमिहिर को आदर व श्रद्धा से स्मरण किया जाता है। छठी शताब्दी में वराहमिहिर ने ज्योतिष के अनेक सिद्धांतों व यंत्रों का आविष्कार किया। कुछ यंत्रों को तो उन्होंने अपात्र के हाथों में पड़ने के भय से प्रकट ही नहीं किया।

उस काल में देश में कला, साहित्य व विज्ञान की अभूतपूर्व प्रगति हुई। भारत व यूनान के मधुर पारस्परिक संबंधों के कारण ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में कई आविष्कार हुए।

आर्यभट्ट के जन्म के कुछ समय पश्चात् ही उज्जयिनी (उज्जैन) में सन् 505 में कापित्थ ग्राम में वाराहमिहिर का जन्म हुआ। उनके पिता थे “आदित्यदास” । एक किंवदन्ती के अनुसार उन्होंने सूर्यदेव की घोर उपासना के पश्चात् ही पुत्र प्राप्ति का वरदान पाया था। सूर्य उनके कुल देवता थे।

वाराहमिहिर के नामकरण के पीछे भी अनेक प्रसंग प्रचलित हैं। उन्होंने अपने पिता से ही ज्योतिष विद्या का ज्ञान पाया था। फलतः उन्हें राजा विक्रमादित्य का आश्रय प्राप्त हुआ। राजा के यहाँ पुत्र रत्न का जन्म होने पर मिहिर ने भविष्यवाणी की “उक्त तिथि को राजा का पुत्र एक वाराह (सूअर) के हाथों मारा जाएगा।”

राजा ने अपने पुत्र की रक्षा का भरसक प्रयत्न किया परंतु मिहिर की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हो कर रही। तब से ही उन्हें वराहमिहिर कह कर पुकारा जाने लगा। वाराहमिहिर फलित ज्योतिष व गणित के आचार्य थे परंतु उनकी रुचि फलित ज्योतिष में अधिक थी।

उन्होंने लघुजातक, बृहज्जातक, योगयात्रा, बृहत्संहिता व पंचसिद्धांतिका आदि ग्रंथ लिखे। “लघुजातक’ व ‘बृहज्जातक’ में उन्होंने फलित ज्योतिष के महत्त्व पर चर्चा की है। यही ज्ञान उस युग में खगोल विद्या व गणित के अध्ययन का प्रेरणा स्रोत था।

गणित ज्योतिष की दृष्टि से पंचसिद्धांतिका का भी भारी महत्त्व है। इसका अर्थ है “पाँच सिद्धांत”। इस ग्रंथ के अभाव में ज्योतिष इतिहास का ज्ञान अधूरा रह जाता। इस ग्रंथ में उन्होंने पैतामह, रोमक, वासिष्ठ, पोलिश और सौर इन पाँच सिद्धांतों का समावेश किया है। सौर सिद्धांत को उन्होंने सर्वश्रेष्ठ माना। उन्होंने आर्यभट्ट के पृथ्वी परिभ्रमण सिद्धांत के विषय में कहा

“यदि पृथ्वी घूमती है तो एक पक्षी, जो अपने घोंसले से उड़कर पश्चिम दिशा की ओर चलता जाए तो लौट कर घोंसले में वापिस कैसे आ सकता था।” ज्योतिष विज्ञान का ज्ञानी होने पर भी उन्होंने अपने नाम से कोई सिद्धांत नहीं चलाया। यह सत्य ही है कि विद्वजन फलों से लदे वृक्ष की भाँति विनम्र होते हैं ।

वाराहमिहिर यायावर प्रकृति के थे। पूरे भारत का भ्रमण करने के पश्चात् उनके ग्रंथों में देखे गए स्थानों का वर्णन आना स्वभाविक ही था। अतः उनके ग्रंथों का इतिहासवेत्ताओं के लिए भी विशेष महत्त्व है। उनकी पुस्तकों में छठी शताब्दी के भारत का सुंदर चित्र उभरता है।

उनके कुछेक सिद्धांत ऐसे भी हैं जो आधुनिक विज्ञान से मेल नहीं खाते परंतु अधिकांश बातें प्रमाणिकता की कसौटी पर खरी उतरती हैं। “पृथ्वी गोल है तथा आकाश में बिना किसी आधार के स्थित है” इस सिद्धांत को उन्होंने एक श्लोक के माध्यम से स्पष्ट किया।

पंचभूत से बनी पृथ्वी का गोला तारों के पंजर के बीच उसी तरह स्थित है जिस प्रकार चुंबक के बीच लोहा, ज्यों-ज्यों प्रतिदिन चंद्रमा का स्थान सूर्य की तुलना में बदलता है-त्यों-त्यों उसका चमकीला भाग बढ़ता जाता है-ठीक उसी तरह जैसे दोपहर के बाद सूर्य के प्रकाश से घड़े का पश्चिमी भाग धीरे-धीरे अधिक और अधिक चमकता जाता है।”

बृहज्जातक ग्रंथ के तीसरे खण्ड में उन्होंने ज्योतिष के अतिरिक्त दूसरी विधाओं पर भी प्रकाश डाला है। इस भाग से तत्कालीन राज्यों, जनपदों, लोक-प्रचलित विश्वासों की सुंदर झांकी देखने को मिलती है।

वाराहमिहिर को कृषि विज्ञान की भी अच्छी जानकारी थी। वे पौधों की स्थिति का विश्लेषण कर, आगामी वर्षा व अकाल का अनुमान भी लगा सकते थे। उन्होंने अपने ग्रंथ में मिट्टी के उपजाऊपन को बढ़ाने वाली खाद बनाने, उन्नत बीज विकसित करने व मौसम के प्रभावों, दुष्प्रभावों का वर्णन किया है।

प्रायः विद्वान अपने ज्ञान की श्रेष्ठता को सिद्ध करने के प्रयास में दूसरे विद्वानों को हेय दृष्टि से देखते हैं परंतु वाराहमिहिर एक अपवाद थे। उन्होंने यूनानी ज्योतिषशास्त्र से अपना ज्ञान तो बढ़ाया ही। साथ ही स्थान-स्थान पर उसका उल्लेख भी किया। ग्रंथों में यूनानी भाषा के अनेक शब्दों को वे ज्यों का त्यों ले लेते थे। वे लिखते हैं

“यूनानी लोग म्लेच्छ जाति के होने पर भी आदरणीय हैं क्योंकि उन्हें विज्ञान का अच्छा ज्ञान है तथा वे कई बातों में दूसरों से आगे हैं?” वाराहमिहिर के ग्रंथ आज भी अनेक ऐसी अभिज्ञताएं समेटे हैं। जिनके मनन से आधुनिक विज्ञान को सहायता मिल सकती है। आवश्यकता है तो केवल उसे जानने व समझने की।

यह भी पढ़े –

Follow us on Google News:

Kamlesh Kumar

मेरा नाम कमलेश कुमार है। मैं मास्टर इन कंप्यूटर एप्लीकेशन (Master in Computer Application) में स्नातकोत्तर हूं और CanDefine.com में एडिटर के रूप में कार्य करता हूँ। मुझे इस क्षेत्र में 3 वर्ष का अनुभव है और मुझे हिंदी भाषा में काफी रुचि है। मेरे द्वारा स्वास्थ्य, कंप्यूटर, मनोरंजन, सरकारी योजना, निबंध, जीवनी, क्रिकेट आदि जैसी विभिन्न श्रेणियों पर आर्टिकल लिखता हूँ और आपको आर्टिकल में सारी जानकारी प्रदान करना मेरा उद्देश्य है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *