वृक्षारोपण पर निबंध? वनों की रक्षा पर निबंध?

वृक्षारोपण पर निबंध (Vriksharopan Par Nibandh) :- भारतीय संस्कृति वन-प्रधान है। यहाँ के ऋषि-मुनियों को वनों से प्यार था तो राजा तथा अन्य लोग भी चौथी उम्र में संन्यास लेकर वनों में ही चले जाते थे। जरा जाइए किसी वन में, जहाँ चारों ओर नाना प्रकार के हरे-भरे वृक्ष हों, अनेक प्रकार की लताएँ हों, विभिन्न प्रकार की झाड़ियाँ हों, उन पर फूल खिले हों, भौंरे मंडरा रहे हों, तितलियाँ नाच रही हों, पक्षी चहक रहे हों; कितना आनन्द आ जाएगा? वनों के इस मनोहारी दृश्य से मन को कितना अद्भुत सुख मिलता है। कुछ देर के लिए तो हृदय का मैल धुल जाता है। इसलिए हमारे ग्रंथों में वन पवित्र माने गए हैं, वृक्षारोपण पुण्य का कार्य माना गया है तथा वृक्षों का काटना पाप कहा गया है।

वृक्षारोपण पर निबंध (Vriksharopan Par Nibandh)

वृक्षारोपण पर निबंध

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वृक्षारोपण पर निबंध

महाकवि कालिदास ने अपने सुप्रसिद्ध नाटक ‘शाकुन्तलम्’ मंत लिखा है कि शकुन्तला मण्डनप्रिय होते हुए भी वृक्षों के स्नेह के कारण उनके पत्ते नहीं तोड़ती थी। “नादत्ते प्रिय मण्डनापि भवतो स्नेहेन या । पल्लवम् ।” पुराणों में घर बनाने वालों को कहा गया है कि भवन के उत्तर में पलाश, दक्षिण में आम, पूर्व में वट तथा पश्चिम में पीपल का वृक्ष लगाना चाहिए तथा घर के आगे फुलवारी लगानी चाहिए। ऋषि-मुनि इन वृक्षों को देवता मानते थे।

वृक्षों और वनों की आवश्यकता

यह सभी जानते हैं कि विश्व का निर्माण, विकास व रक्षा प्रकृति पर ही निर्भर है और प्रकृति के निर्माण व रक्षा में वनों का-अर्थात् वनों के वृक्षों, लता-पादपों, गुल्मों, तृणों का बहुत बड़ा महत्त्व है। पृथ्वी पर मनुष्य के अस्तित्व के लिए वृक्ष अत्यावश्यक है; क्योंकि वृक्ष ही मिट्टी के मुख्य रक्षक हैं। वे आँधियों के बेग को रोकते हैं और मिट्टी को उड़ाने से बचाते हैं। वृक्ष ही पर्वतों को स्थिर रखते हैं तथा वायु को शुद्ध व शीतल रखते हैं। वनों से पशु-पक्षियों की रक्षा होती है।

सिंह, व्याघ्र, रीछ, हाथी, गैंडे, बकरी, मृग आदि पशु तथा मोर, कोयल, पपीहा, चकवा आदि पक्षियों का सौंदर्य वनों में देखने को मिलता है। वन और वृक्ष ही वर्षा के कारण होते हैं। जहाँ वृक्ष अधिक होते हैं, ऐसे पर्वतीय या जंगली स्थानों पर वर्षा अच्छी होती है, किन्तु रेगिस्तान पानी के लिए तरसता रहता है। वर्षा से ही अन्न उत्पन्न होता है और अन्न से मनुष्य जीवित रहते हैं। (अन्नाद् भवन्ति भूतानि, पर्जन्यादन्न सम्भवः।)

भूमि की उपजाऊ शक्ति वृक्षों से ही कायम रहती है और भूमि का क्षरण रुकता है। विभिन्न प्रकार की वनस्पतियाँ हमें वनों से ही मिलती हैं। अनेक वृक्षों की पत्तियों को घास के रूप में खाकर पशु जीवित रहते हैं। वृक्षों से ही हमें ईंधन और भवन निर्माण के लिए तथा खेल-सामान बनाने के लिए काष्ठ मिलता है। रेल, जलयान या वायुयान के निर्माण में वृक्षों से प्राप्त लकड़ी का ही उपयोग होता है। भाँति-भाँति की दवाइयाँ, गोंद, कागज, दियासलाई और कई प्रकार के तेल, अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व पौष्टिक फलों की प्राप्ति हमें वनों और वृक्षों से ही होती है। वृक्षों की छाया ग्रीष्म के ताप से संतप्त जनों को शीतलता प्रदान करती है। इनके फलों की सुगन्ध मन-मस्तिष्क को ताजगी देती है।

वृक्षों और वनों का नाश

वृक्षों और वनों के उक्त महत्त्व को जानते हुए भी आज हम (सरकार भी) कृषि भूमि के विस्तार के लिए, नई-नई सड़कें बनाने के नाम पर, नये विशाल बाँध बनाने के नाम पर जंगलों, वृक्षों और वनों को काटते जा रहे हैं, नए वृक्ष लगाने की ओर किसी का ध्यान ही नहीं है। परिणाम भी सामने है-रेगिस्तान बढ़ते जा रहे हैं। वृक्षों के काटने से मिट्टी स्थिर नहीं रह पा रही। फलतः पर्वतीय भूमि का क्षरण हो रहा है। नदियों में बाढ़ आ रही है और कहीं वर्षा के अभाव से सूखा पड़ रहा है।

यदि यही स्थिति रही तो कुछ वर्षों में ही ईंधन, इमारती लकड़ी, पशुओं के लिए घास और जड़ी-बूटियों के लिए यहाँ हाहाकार मच जाएगा। ठीक समय पर वर्षा न होगी। वर्षा के अभाव में अन्न न होगा। अन्न के अभाव में मनुष्य जीवित न रहेगा। गाँव के लोग करोड़ों मन प्राकृतिक खाद-गोबर को-ईंधन के रूप में जला देते हैं और खेत खाद की कमी से अधिक अन्न नहीं दे पाते। वे गोबर को इसलिए जलाते हैं कि ईंधन के लिए वृक्ष नहीं हैं। अगर वृक्ष अधिक हो तो जलावन के लिए गोबर को क्यों काम में लाया जायेगा?

वृक्षारोपण आवश्यक

उक्त सभी बातों को ध्यान में रखकर आज वृक्षारोपण की अत्यन्त आवश्यकता है। गाँवों में परती भूमि में या वृक्षहीन पर्वतों पर यदि वृक्षारोपण होगा तो ग्रामवासियों को उनसे ईंधन मिलेगा; फल मिलेंगे और पशुओं के लिए हरा-हरा चारा भी मिलेगा। हरे चारे से पशु अधिक दूध देंगे। वृक्षों के आरोपण से प्रकृति में शुद्धता व शीतलता आयेगी, जिससे वर्षा होगी, वर्षा से अन्न होगा। वृक्षों व वनों के लगाने से मिट्टी स्थिर रहेगी, भूमि का क्षरण नहीं होगा, पहाड़ों का स्खलन रुकेगा, नदियों में बाढ़ न आएगी और रेगिस्तान का विस्तार भी रुक जाएगा।

किस प्रकार के वृक्ष लगाएँ?

वृक्ष ऐसे लगाने चाहिएँ जो उपयोगी हो। खेतों से बाहर या पर्वतीय भूमि पर इमारती लकड़ी वाले वृक्ष जैसे-शीशम, साल, टीक, बांज, बबूल, तुन आदि के पेड़ लगाए जाएं। खैर, पीपल, बड़, नीम, आदि के पेड़ सड़कों के किनारे लगाए जा सकते हैं। घास व कागज आदि के लिए बाँस भी लगाया जा सकता है। दियासलाई की तीलियों, कागज की लुगदी ओर प्लाईवुड के लिए पापलर भी लगाया जा सकता है। वैसे दियासलाई के लिए सेमल का पेड़ बड़े ही काम का होता है।

घरों के आस-पास फलदार पेड़ जैसे-आम, आडू, अमरूद, पपीता, जामुन, नींबू, कटहल आदि लगाने चाहिएँ। सबसे बड़ी बात तो यह है कि जिस प्रदेश की जलवायु में जो वृक्ष सबसे अधिक उग सकें, उन्हें ही लगाया जाना चाहिए। इनमें स्वादिष्ट व पौष्टिक फल मिलते हैं और पेड़ों के सूखने पर लकड़ी भी मिलती है। खेतों की मेड़ों पर नीम, आँवला, शीशम आदि के पेड़ लग सकते हैं, क्योंकि वे कृषि को हानि नहीं पहुँचाते और उनसे छाया भी पर्याप्त मिलती है।

उपसंहार

अतः देश की उन्नति में वृक्षों को लगाना होगा और वनों की रक्षा भी करनी होगी। किन्तु यह भी ध्यान रखा जाय कि भारत की जलवायु के अनुकूल होने पर भी व्यापारिक दृष्टिकोण से लगाये जाने वाले युक्लिप्टस लैसे अधिक पानी का शोषण करने वाले पेड़ों को नहीं लगाया जाना चाहिए और साथ ही इमारती तथा अन्य वृक्षों को कटाई के लिए उन से दुगुने वृक्षों का आरोपण की शर्त भी अनिवार्य रूप से रखनी चाहिए ताकि वन नष्ट न हों। इसी से देश की सर्व प्रकार से समृद्धि होगी तथा हमें स्वस्थ व सुन्दर प्राकृतिक वातावरण प्राप्त होगा। वृक्षारोपण पर निबंध

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