यतीन्द्र नाथ मुखर्जी कौन थे? यतीन्द्र नाथ मुखर्जी का जीवन परिचय बताये?

यतीन्द्र नाथ मुखर्जी का जीवन परिचय (Yatindra Nath Mukherjee Ka Jivan Parichay), ऐसे ही साहसी, कर्मठ और उत्साही क्रान्तिकारी यतीन्द्र नाथ मुखर्जी का जन्म जैसोर जिले में 1880 ई. में हुआ था। यतीन्द्र नाथ मुखर्जी कौन थे?

यतीन्द्र नाथ मुखर्जी का जीवन परिचय (Yatindra Nath Mukherjee Ka Jivan Parichay)

यतीन्द्र नाथ मुखर्जी का जीवन परिचय
यतीन्द्र नाथ मुखर्जी का जीवन परिचय (Yatindra Nath Mukherjee Ka Jivan Parichay)

यतीन्द्र नाथ मुखर्जी का जीवन परिचय (Yatindra Nath Mukherjee Ka Jivan Parichay)

रूस, चीन, अमेरिका, फ्रांस और जर्मनी के समाचार पत्रों में नवयुवक दामोदर सावरकर के तर्कसंगत लेखों ने भारतीय सैनिकों में स्वदेश प्रेम की भावना जाग्रत करनी शुरू कर दी थी। उन्हें प्रेरणा दी कि मातृ-भूमि की रक्षा के लिए उनका सहयोग सराहनीय होगा।

इंडियन होम रूल सोसाइटी के युवक घर-घर भारतीय युवकों से सम्पर्क कर यही प्रतिज्ञा कराते कि भारत एक स्वतन्त्र राष्ट्र बनकर रहेगा। इस राष्ट्र की एक ही भाषा होगी और एक ही लिपि होगी। जनता द्वारा चुना गया व्यक्ति ही इस स्वतन्त्र राष्ट्र का राष्ट्रपति बनेगा। भारत से अंग्रेजों को बाहर खदेड़ना हमारा लक्ष्य है।

रूसी क्रान्तिकारियों के सहयोग से सावरकर ने सेनापति बापट और हेमचन्द्र दास जैसे उत्साही नवयुवकों को बम निर्माण कला में दक्ष बनाने हेतु रूस भेजा और लन्दन से ही भारतीय क्रान्तिकारियों के लिए पिस्तौलों का पार्सल भी भिजवा दिया गया।

वे 1906 में सुप्रसिद्ध देशभक्त प. श्यामजी कृष्ण वर्मा की शिवाजी छात्रवृत्ति के माध्यम से लन्दन पहुँचकर “भारत भवन’ में ‘अभिनव भारत’ की शाखा खोल अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर स्वाधीनता संग्राम का स्वरूप प्रस्तुत करने में संलग्न थे।

जहाँ विदेश में भारतीय गुप्त संगठनों के द्वारा विद्रोह की ज्वाला भड़का रहे थे बंगाल के क्रान्तिकारी भी चुपचाप नहीं बैठे थे। सशस्त्र क्रान्ति के लिए धन और अस्त्र-शस्त्रों की बड़ी आवश्यकता थी। क्रान्ति के प्रारम्भिक दौर में जनता ने उन्हें धन से सहायता भी की किन्तु चन्दे से इस महायज्ञ को क्या प्राप्त होता नरेन्द्र गोस्वामी मुखबिर बनने के कारण लोगों से चन्दा भी मिलना बन्द हो गया।

ऐसी स्थिति में डकैती धन, अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करने एक मात्र सुगम साधन क्रान्तिकारियों के सामने शेष बचा था। डकैती डालना उनकी विवशता थी क्योंकि अन्य कोई चारा न था सदस्यों के आवागमन और दैनिक खर्च का संगठन का कितने दिन सदस्यों की जेब के पैसों से कार्य चलना सम्भव ? ऐसी स्थिति में निर्णय लिया गया कि संगठन चलाने के लिए सावधानीपूर्वक डकैती की योजना अमल में लायें।

विक्रमपुर में रवीन्द्र मोहन सेन और वीरेन्द्र चटर्जी के नेतृत्व में डकैती के समय एक क्रान्तिकारी द्वारा एक महिला के गले से हार छीनने के अपराध उसे दंडित भी किया गया जिससे सदस्य भविष्य में गलत आचरण न करें।

यतीन्द्र नाथ मुखर्जी की शिक्षा

जब वे केवल पाँच वर्ष का देहावसान हो गया। धर्मनिष्ठ परिश्रमी माँ ने शिशु का लालन-पालन बड़ी कठिनाई से किया। 1918 ई. में यतीन्द्र नाथ मुखर्जी 18 वर्ष की आयु में मैट्रिक पास कर ली और परिवार की जीविका के लिए कलकत्ते स्टेनोग्राफी का अध्ययन कर कलकत्ता सचिवालय से जुड़ गये।

चीता और यतीन्द्र नाथ में मल्लयुद्ध

वे बचपन से ही शारीरिक रूप से बलवान एवं हृष्ट-पुष्ट रहे। एक मजेदार संस्मरण यह कि अचानक नदिया जिले के सुनसान जंगलों से उन्हें गुजरना पड़ा। उनकी उम्र 27 वर्ष के लगभग थी। उस जंगल में एक चीते का आतंक पहले से ही फैला था। कई मौतें हो चुकी थीं।

मार्ग में बढ़ते कदमों से अचानक निकट के पेड़ों पर उड़ते पक्षियों के कोलाहलपूर्ण रुदन सुना। उन्हें कुछ अनहोनी का आभास हुआ। कदम धीमे-धीमे उठा वे आगे बढ़ना ही चाहते कि एक विकराल चीते फौरन उछलकर आक्रमण कर दिया।

चीता और यतीन्द्र नाथ में मल्लयुद्ध उन कंटकपूर्ण वीथियों में हुआ। मुखर्जी ने भयानक चीते के भीषण प्रहारों का मुकाबला मात्र एक हँसिये से किया और अन्त उस चीते को यमलोक पहुँचाकर दम लिया। और इस कांड पश्चात् यतीन नाम से ही प्रख्यात गये।

यतीन्द्र नाथ मुखर्जी का क्रान्तिकारी संगठन से जुड़ना

अंग्रेजों ने ‘बंग-भंग’ करने को योजना बनायी बंगालियों खुलकर विद्रोह का बीड़ा उठा लिया। हर स्थान पर पिकेटिंग, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी चीजों का प्रचार, जुलूस, सभाएँ और वन्दे मातरम् की ध्वनि बंगाल गूँजने लगा। इस आन्दोलन यतीन्द्र नाथ मुखर्जी नये खून को आकर्षित
किया।

मुखर्जी साम्राज्यशाही की नौकरी त्यागकर क्रान्तिकारी संगठन से जुड़ने के लिए आगे बढ़े और इस आन्दोलन में साहस से कूद पड़े। क्रान्तिकारी संगठन में कार्यरत अचानक वे 1910 में हावड़ा षड्यन्त्र केस में पकड़े गये।

इस अपराध में उन्हें 1 वर्ष की जेल हो गयी। जेल जीवन से मुक्ति प्राप्त कर अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य बने और युगान्तर का कार्य भी सँभालना शुरू कर दिया। जब महायुद्ध के बादल बंगाल पर मँडराये तो बंगाली अधिक सक्रिय हो क्रान्तिकारी गतिविधियों में बड़ी तीव्रता से कार्यरत हो गये।

‘पूँजीवादी समाज समाप्त कर श्रेणीहीन समाज की स्थापना क्रान्तिकारियों का लक्ष्य है। देशी-विदेशी शोषण से मुक्त कराना और आत्मनिर्णय द्वारा जीवन का अवसर देना हमारी माँग है।’ एक मंच से भाषण में मुखर्जी ने कहा था।

विनायक सावरकर द्वारा प्रकाशित ‘हिन्दुस्तान का गौरव’ आदि लेखों को गोरी सरकार ने ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध विद्रोह भड़कानेवाला साहित्य घोषित कर जब्त कर लिया। उधर देश में जागरण का कार्य जनता में लोकमान्य तिलक द्वारा प्रकाशित पत्र ‘केसरी’ करके उन्हें अपने कर्तव्य और लक्ष्य के प्रति सतर्क करने में जुटा था।

सभी का एकमात्र लक्ष्य था- स्वाधीनता प्राप्त कर अंग्रेजों को देश से बाहर खदेड़ना। जनता क्रान्ति के रहस्य को भी समझने लगी थी। अस्त्र-शस्त्र के प्रबन्ध के लिए डकैती नैतिक अड़चन न होने के कारण कुछ अमीर घरानों में हुई डकैतियों में क्रान्तिकारियों ने वीरता, साहस और त्याग का परिचय दिया। धन का अपव्यय या दुरुपयोग नहीं किया गया, सदस्यों पर जो धन खर्च हुआ वह सोच-विचारकर कम-से-कम किया गया।

डकैती

दुलरिया नामक एक स्थान पर भीषण डकैती के दौरान अपने दल के सहयोगी की गोली से क्रान्तिकारी अमृत सरकार घायल हो गये। धन काफी मात्रा में हाथ लगा, किन्तु परिस्थिति विकट फँसी थी कि धन लेकर भागें अथवा साथी की जान की रक्षा करने की चेष्ट करें।

अमृत सरकार ने अपने साथियों को समझाया कि वे लोग धन लेकर फौरन भाग लें, इतना धन क्रान्तिकारियों के हाथ सरलता से नहीं आयेगा। यतीन्द्र मुखर्जी अपने नेता को सुन हतप्रभ थे। अमृत सरकार ने आगे आदेश दिया- ‘मुझे यहीं छोड़ मेरा सिर साथ काटकर ले जाओ जिससे पुलिस मुझे पहचान न सके।

ऐसी वीरता और त्याग का असाधारण उदाहरण आजकल मिलना असम्भव है। इसके अतिरिक्त यतीन्द्र नाथ मुखर्जी ने विप्लवकारी त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती के सहयोग से नौकाओं के माध्यम से भी बड़ी वीरता, साहस और चतुराई का परिचय दिया। चक्रवर्ती को उन दिनों महाराज के नाम से लोग सम्बोधित करते थे।

इन डकैतियों में ‘गार्डन रीच’ की डकैती बड़ी रोमांचक मानी जाती है। जिसके नेता यतीन्द्र नाथ मुखर्जी थे सर्वप्रथम इस डकैती में टैक्सी उपयोग में लायी गयी। साउथ इंडिया जूट मिल के कुलियों का वेतन एवं बोनस कम्पनी के मुख्य कार्यालय से अठारह हजार रुपये भेजना था, यह धन खजांची दो सहयोगियों सहित एक घोड़ागाड़ी में लेकर चला।

क्रान्तिकारी मार्ग में घोड़ागाड़ी रोककर कुल धन छीनकर निकट खड़ी टैक्सी से भाग निकले। इसी प्रकार की एक अन्य डकैती बलिया घाट के एक धनी व्यापारी के निवास पर पड़ी जिसमें पुनः टैक्सी का उपयोग किया गया। मगर जब धन एकत्रित कर टैक्सी में डाला गया तो टैक्सी ड्राइवर ने आगे बढ़ने से इन्कार किया।

क्रान्तिकारियों ने टैक्सी चालक को तत्काल गोली मार दी और वे टैक्सी ले स्वयं सफलता से निकल भागे। इन डकैतियों से अर्जित धन से काफी अस्त्र-शस्त्र खरीदे गये, कुछ कोष में जमा रखा गया। इसके अतिरिक्त क्रान्ति के लिए तो अधिक सामग्री की आवश्यकता थी।

कुछ बन्दूकें और पिस्तौलें इधर-उधर से उड़ा ली जातीं, कुछ विदेशों से प्राप्त भी होतीं मगर इन्हीं से काम नहीं चलाया जा सकता था। अतः हर समय एक ही चिन्ता बनी रहती-अधिक से अधिक सैनिक सामान किसी भी प्रकार उपलब्ध कर लिया जाये जिससे संगठन की क्षमता शक्तिशाली हो, वह दृढ़ता के साथ कठिन मोर्चों पर भी सुचारु रूप से कार्य सम्पन्न कर सके।

विश्वयुद्ध प्रारम्भ हो चुका था। तभी एक महत्त्वपूर्ण मनोरंजक घटना विस्मृत नहीं की जा सकती। कलकत्ता में उस समय बन्दूकें कारतूस के व्यापारी रडा कम्पनी के नाम से कार्यरत थी जिसमें श्रीश सरकार नामक कर्मचारी क्रान्तिकारी सहयोगियों को कुछ आशा बँधाये हुए थे।

इस कम्पनी का सात गाड़ी अस्त्र-शस्त्र जहाज घाट से छुड़ाकर कम्पनी लाते समय एक गाड़ी रास्ते से गायब कर दी गयी। पता ही नहीं चला श्रीश सरकार को गाड़ी सहित कलकत्ते की कौन-सी सड़क निगल गयी। किसी को यह ज्ञात नहीं हो पाया श्रीश सरकार का क्या हुआ।

इस कांड से 52 माउजर पिस्तौलें और पैंतालीस हजार गोलियाँ संगठन को बड़े कार्य कौशल एवं निपुणता से प्राप्त हो गयीं। इस माउजर पिस्तौल की मारक क्षमता तो अधिक दूर तक थी ही विशेषता इसमें यह भी उल्लेखनीय थी कि माउजर पिस्तौल के कुन्दे को अपने कन्धे से सटाकर उसे बन्दूक के समान भी उपयोग में लाया जा सकता था।

इस चोरी की रपट सरकार में जब दर्ज हुई तो ब्रिटिश हुक्मरान बड़े चिन्तित हुए। सावधानी से खुफिया तन्त्र को भाग-दौड़ करनी पड़ी। क्रान्तिकारियों के अड्डों पर घर-पकड़ तेज कर दी गयी क्रान्तिकारी भूमिगत हो गये। इतना लाभ अवश्य हुआ कि इन्हीं माउजर पिस्तौलों ने अनेक मुखबिरों को शान्ति की नींद सुलाकर उनके कलंक धो डाले थे।

जयचन्द अपनी जान बचाने के लिए घर से बाहर निकलने में कतराते और घबराते थे। उनकी नींद हराम हो चुकी थी। पुलिस तन्त्र भी अपनी जान की रक्षा के लिए क्रान्तिकारियों पर हाथ डालने से पूर्व विशेष सावधानी बरतता।

सरकार को यह ज्ञात हो चुका था कि इन बलिया घाट एवं गार्डन रीच डकैतियों में यतीन्द्र नाथ मुखर्जी का हाथ तो है ही इसके अतिरिक्त जो माल विदेशों से प्राप्त हो रहा है उसका सरगना भी मुखर्जी ही है जिसे पकड़ना सरकार की एक चुनौती बन चुकी थी।

हर ओर यतीन्द्र नाथ मुखर्जी का आतंक विद्यमान था। उसका नाम कलकत्ते की सड़कों पर चर्चा का विषय बन चुका था। बंगाली युवकों का एक मात्र नेता यतीनद्र नाथ मुखर्जी का दबदबा सरकार का सिरदर्द बन गया था।

सरकारी नौकरी से अलग हो अब यतीन्द्र नाथ मुखर्जी पूर्ण रूप से संगठन से ही जुड़ गये थे। जीविका का साधन यहीं से चलता मगर उनके विलक्षण नेतृत्व, निर्भीकता, निःस्वार्थ सेवा ने बंगाली क्रान्तिकारियों में एक महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया था। जीविका के लिए उन्होंने ठेकेदारी का व्यसवाय भी साथ अपनाया था जो आगे अधिक नहीं चल सका। पुलिस ठेकेदारी कहाँ करने देती ?

यतीन्द्र नाथ की गतिविधियों से सरकारी तन्त्र परेशान था मगर शिकार हाथ आने से पूर्व रफूचक्कर हो जाता। पुलिस हाथ मलती रह जाती। पुलिस गाड़ी में बैठकर कुछ सैनिकों ने कलकत्ते की एक फर्म ‘हेरी एंड

सन्स’ पर छापा मारा। तलाशी के दौरान कुछ सन्दिग्ध व्यक्तियों को पकड़ लिया गया। खुफिया आधार पर ज्ञात हुआ था कि विदेशी सामान इसी फर्म के नाम से आता है। कुछ अन्य कागजातों से एक नाम और उभरकर आया ‘यूनिवर्सल इम्पोरियम’, बालासोर। इस सूचना को आधार बनाकर इम्पोरियम की तलाशी ली गयी। वहाँ चुपचाप छापा मारा गया।

उन दिनों यतीन्द्र नाथ ‘यूनिवर्सल इम्पोरियम’, बालासोर को ही गोपनीय अड्डे के तौर पर चला रहे थे। सहयोगियों को पुलिस की भनक मिली। इधर-उधर आवश्यक सामान छुपा लिया गया, किन्तु तलाशी में एक कागज प्राप्त हुआ जिस पर अंकित था-‘काली पोक्ष’।

पुलिस ने इस परचे के आधार पर आगे छानवीन की। स्थानीय लोगों को मालूम ही नहीं था ‘काली पोक्ष’ बला क्या है? पुलिस को ही अचरज से देखा गया इसलिए लोग उस स्थल तक ले आये। जब गश्ती दल छानबीन करता पहुँचा तो ज्ञात हुआ कि वह आश्रम संगठन कार्यकत्ताओं का गुप्त अड्डा था।

क्रान्तिकारी पुलिस के पहुंचने से पूर्व बसेरा खाली कर उड़ चुके थे एक चालाक पक्षी के समान। पुलिस हाथ मलती रह गयी। कुछ गोलियों के निशान और पदचाप की सहायता से पुलिस टुकड़ी पीछा करती आगे बढ़ती रही किन्तु असफलता ही हाथ लगी।

यतीन्द्र नाथ मुखर्जी अपने साथी मनोरंजन, नीरेन, यतीश और चित्तप्रिय को साथ लेकर गोविन्दपुर गाँव निकल लिये थे। गोविन्दपुर गाँव बूढ़ी वालान नदी के किनारे बसा था। नदी को पार करना आवश्यक था। अपरिचित चेहरों ने नदी किनारे नाव के निकट पहुँच माँझी की तलाश की। अन्य ग्रामवासियों के सम्मुख ही माँझी ने पूछा- ‘सरकार, जाना कहाँ है?

जैसे माँझी शंकालु हो। संगठन के सहयोगी चित्तप्रिय के मुँह से हठात् निकल पड़ा- ‘स्टेशन’। माँझी ने व्यंग करते पूछ लिया ‘नाव स्टेशन कहाँ जायेगी स्टेशन के लिए आपको नौका चाहिए? ग्रामवासी भोली मुस्कान लिये हँस पड़े।

वार्तालाप हँसी-मजाक में डूबी थी, कुछ और लोग निकट जमा हो गये जिनमें गाँव का एक अमीर राज महन्ती भी पहुँच चुका था। यतीन बाबू साथियों को ले उस स्थल को तत्काल छोड़नेवाले ही थे कि राज महन्ती ने गाँव के लोगों की सहायता से उन्हें आगे बढ़कर पकड़ने की चेतावनी दी- ‘पकड़ लो, भागने न पायें गाँव के दुश्मन हैं ये लोग।

बढ़ती भीड़ को तितर-बितर करने की चेष्टा क्रान्तिकारियों ने की मगर राज महन्ती और गाँववालों का काफिला जोश में आगे बढ़ता ही गया। यतीन्द्र नाथ ने अपने रिवाल्वर से गोली चलाने से पूर्व उन्हें रास्ता छोड़ने का आग्रह किया।

भीड़ भीड़ होती है, भेड़ों के समान कूदती फाँदती उन पर हमले के मूड में लपकी गोली का स्वर आकाश में गूँजा भीड़ में भगदड़ मची। राज महन्ती का शरीर गोली लगते ही धराशायी हो गया। खून की बूँदों से जमीन लाल हो गयी। क्रान्तिकारियों ने खिसकना शुरू कर दिया।

यह समाचार आग की तरह बालासोर के जिला मजिस्ट्रेट किल्वी को पहुँचा दिया गया। ऐसी विकट स्थिति में यतीन्द्र नाथ ने एक सूखे पोखर के ऊपर पेड़ों की छाँह अपना आश्रय बना डाला क्योंकि आगे बढ़ना खतरे से खाली न था। चारों ओर जाने का रास्ता कहीं से सम्भव नहीं था। चुना गया स्थल ऊँचाई पर था। जिसके इर्द-गिर्द ऊँची-ऊँची झाड़ियाँ-ही-झाड़ियाँ दूर-दूर तक फैली नजर

आती थीं। यतीन्द्र बाबू ने एक ऊँचे पेड़ पर कपड़ा टाँगकर किल्वी को सावधान कर दिया था कि क्रान्तिकारी यहाँ मरने-मारने के लिए बिलकुल तैयार हैं। सहयोगियों ने यतीन्द्र नाथ से परामर्श भी किया कि ‘आप निकल जायें, हम सरकारी कुत्तों का सामना करेंगे।’ यतीन्द्र बाबू बोले- ‘यतीश बीमार है, उसे छोड़ मैं यहाँ से अकेला जा नहीं सकता।

इसी स्थल पर युद्ध करता हुआ मृत्यु का वरण करूँगा। मुझे जीवन की इच्छा नहीं है।’ कुछ समय के उपरान्त यही पोखर रणक्षेत्र बन गया जब दोनों ओर से गोलियों की चीत्कारें कानों को बींधने लगीं। यतीश को एक पथरीले टीले पर झाड़ियों के झुरमुट की ओट में सुला रखा था। एक ऊँचाई के पेड़ की डाल पर चित्तप्रिय बैठा रिवाल्वर से गोलियों का उत्तर गोलियों से दे रहा था।

दोनों ओर से गोलियों की बौछार चालू थी जैसे बादल पानी के स्थान पर आग बरसा रहे हैं। गोलियाँ गोलियों का उत्तर दे रही थीं। एक ओर था पुलिस के रायफलों की आग और दूसरी ओर माउजर एवं पिस्तौलों की उगली गोलियाँ अचानक चित्तप्रिय की छाती में रायफल की गोली लगी और आहत हो वह जमीन पर आ गिरा।

वह शहीद हो गया था। नीरेन और मनोरंजन अपने-अपने मोर्चे से गोलियाँ दागे जा रहे थे। तभी यतीन्द्र नाथ की आवाज वातावरण में गूँजी- ‘पानी’। वे बुरी तरह से गोलियों की मार से आहत हो चुके थे, सारा शरीर लहूलुहान प्रिय क्रान्तिकारी मुखर्जी को उठाया मनोरंजन ने पीठ पर धीमे-धीमे झाड़ियों के झुरमुट की ओट ले उसने नदी की ओर बढ़ने का साहस किया।

चित्तप्रिय जमीन की गोद में शान्त पड़ा था। मनोरंजन भी पूरी तरह आहत था इसलिए तीन-चार कदम बढ़ने पर ही वह लड़खड़ाकर गिरता, पड़ता फिर यतीन्द्र को लादता आगे बढ़ने की चेष्टा करता किल्वी से यह दृश्य देखा नहीं गया।

यतीन्द्र नाथ ने देखा, चित्तप्रिय मारा जा चुका। स्वयं कुछ क्षणों ही में यह शरीर भी साथ छोड़ देगा इसलिए युद्ध बन्द करने का निर्देश उन्होंने सहयोगियों को तत्काल दे दिया। यतीन्द्र नाथ मुखर्जी का जीवन परिचय

किल्वी ने गोली चलाना बन्द करा दिया। एक सिपाही उन्हीं के आदेश से यतीन्द्र के निकट पानी लेकर आया। पानी की बूँदें उन्होंने अपने घायल लहूलुहान चेहरे पर छिटका लीं। बड़ी गम्भीरता और साहस से निकट पहुँचे किल्वी को गिरफ्तारी दी और चित्तप्रिय गोली चला थे।

तीनों साथी बिलकुल निर्दोष हैं, इन्हें नहीं मालूम हम क्या करने रहे हैं।’ अस्पताल जाकर यतीन्द्र नाथ ने दूसरे दिन प्राण त्याग दिये। तीनों शेष सहयोगी क्रान्तिकारियों यतीश, मनोरंजन और नीरेन को फाँसी पर लटका दिया गया। 10 सितंबर 1915 में यतीन्द्र नाथ मुखर्जी की मृत्यु हो गई।

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